क्रॉसपैथी और चिकित्सा पद्धतियों में समन्वय

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क्रॉसपैथी और चिकित्सा पद्धतियों में समन्वय

जिस तरह से मानव जीवन से जुड़े विभिन्न विषय विभिन्न आयामों में बटे होते हैं और कई बार इन आयामों की विविधता का स्वतंत्र अस्तित्व तथा इनका परस्पर समन्वय जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जरूरी हो जाता है। 

उसी तरह से चिकित्सा जगत में भी इसकी विभिन्न पद्धतियां कभी स्वतंत्र अस्तित्व में ही कारगर दिखती है तो कई बार इनके बीच परस्पर तालमेल की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जाती है। इन दिनों इस तालमेल की मांग बड़े पैमाने पर उठ रही है। विभिन्न पैथी (पद्धतियों) के इस समन्वय को ही क्रॉसपैथी नाम से जाना जाता है। 

चिकित्सा की अलग अलग पद्धतियो ने अलग अलग कालखंड में अपना विशेष स्थान बनाया है। एलोपैथी चिकित्सा के अलावा आर्युवेद, होम्योपैथी, यूनानी, सिद्ध, प्राकृत चिकित्सा, कलर थेरेपी, संगीत थैरेपी, वाटर थेरेपी, मैग्नेट थेरेपी जैसे तमाम पैथियो के माध्यम से मानव अपने रोग का इलाज कराता रहा है। 

एलोपैथी, जिसकी पहचान भारतीय जनमानस में अंग्रेजी दवा के रूप में है, का विकास बहुत तेजी से हो रहा है और आज यह चतुर्दिक प्रभावी है। इसके बिना चिकित्सा की कल्पना तो कभी-कभी मुश्किल सी लगने लगती है। 

वहीं आर्युवेद व प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियां भारतीय जनमानस के जनजीवन का अंग रही है। आजकल विभिन्न पद्धतियों के प्रयोग में परस्पर मिश्रण की संभावना बढ़ जाती है और ऐसी स्थिति में ही क्रॉसपेथी जैसी अवधारणा चर्चा का केंद्र बन जाती है। 

सभी पेथिओ के अपने-अपने गुण दोष रहे हैं। सभी पेथियो ने कुछ विशेष रोगों पर विजय प्राप्त की है। सभी का महत्व अपने अपने क्षेत्र में विशेष है। इन सबके बीच अब इनके समन्वय का वक्त आ गया है।

क्या है क्रॉसपेथी?

मरीज को एक पैथी (पद्धति) के डॉक्टर अपनी पैथी से इतर जाकर दूसरी पैथी से इलाज की सलाह देते हैं तो यह स्थिति क्रॉसपैथी कहलाती है। जैसे यदि आयुर्वेदिक वैद्य एलोपैथिक दवाइयां दे या अंग्रेजी डॉक्टर आर्युवेद की दवाइयां दे तो यह क्रोसपैथी है। 

क्रोसपैथी कोई नूतन अवधारणा नहीं है। व्यवहारिक तौर पर यह काफी पुरानी है। आयुष की विभिन्न पद्धतियों में काफी पहले से ही परस्पर समन्वय रहा है। 

जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध अपने अपने स्वरूप में करते रहे हैं। इसमें कोई विवाद भी नहीं रहा है। स्वाभाविक रूप से ये पद्धतियां एक दूसरे की सहयोगी बनती रहती है। वाद विवाद तब होता है जब इन का टकराव आधुनिक चिकित्सा पद्धति से होता है।

वर्तमान स्थिति

पिछले छह दशकों में एलोपैथी ने अपनी पकड़ मजबूत की है। इसका मुख्य कारण यह है कि इसके पास रोग पहचान का तरीका ज्यादा प्रत्यक्ष वैज्ञानिक लगता है। 

इन दिनों शल्य चिकित्सा या त्वरित आराम देने में इसे ही महारत हासिल है। यही कारण है कि लोगों में एलोपैथिक पर भरोसा ज्यादा बढ़ गया है। 

भागदौड़ के इस युग में सभी चाहते हैं कि उनका इलाज जल्द हो। इस ‘जल्द’ के कारण ही बाकी पैथ के चिकित्सक चाहते हैं कि एलोपैथी की कुछ जरूरी दवाइयां लिखने की उन्हें अनुमति मिले। 

वहीं एलोपैथी के चिकित्सक भी कभी-कभी अन्य चिकित्सा पद्धतियों में दिलचस्पी रखते हैं। लेकिन तकनीकी मजबूरियों के कारण वह मरीजों को अपनी पेथि से इतर कोई सलाह नहीं दे पाते हैं। 

हालांकि सरकार इस दिशा में सक्रिय है की आयुर्वेदिक चिकित्सकों को आपात स्थितियों में एलोपैथी का इस्तेमाल करने लायक प्रशिक्षण दिया जाए। आयुष डॉक्टरों का तर्क है कि यदि उन्हें कुछ अति जरूरी दवाइयां लिखने की अनुमति मिल जाएगी तो लोगों को चिकित्सा सुविधा पहुंचाने में उन्हें सहूलियत होगी।

सभी पैथिओ (पद्धतियों) में समन्वय की आवश्यकता

यह सत्य है कि आपातकालीन स्थिति से उबारने में एलोपैथी ने खुद को साबित किया है। ऐसी स्थितियों में आयुर्वेदिक डॉक्टर खुद को असहाय महसूस करते हैं। इसलिए उनका झुकाव एलोपैथी की ओर है। 

इसलिए जरूरत है, सभी पद्धतियों की स्वाभाविकता को समझने और तदनुसार समन्वय पर विचार करने की। इस बाबत केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के अनुसार आर्युवेद के प्रति घटते रुझान के पीछे कारण यह भी है कि वर्तमान पीढ़ी को हमने प्रैक्टिकल करके नहीं दिखाया है। विभिन्न पद्धतियों के समन्वय से है प्रैक्टिकल संभव हो सकता है।

वस्तुतः विशेषज्ञों का मानना है की आयुर्वेदिक शिक्षा की गुणवत्ता पर विशेष बल देने की जरूरत है। नई पीढ़ी आर्युवेद को ठीक से समझ नहीं पाई है। यदि इनकी समझ ठीक से विकसित हो जाए तो उन्हें किसी दूसरी पेथी में जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। 

आधुनिक चिकित्सा पद्धति रोग केंद्रीत करके इलाज करती है जबकि आर्युवेद रोगी की प्रकृति को ध्यान में रखकर चिकित्सा करता है। आर्युवेद में इस्तेमाल होने वाली औषधियां हजारों वर्षों से व्यवहार में लाई जा रही है, जो एक तरह का क्लीनिकल ट्रायल ही है तथा रोगियों के विश्वास का प्रतीक भी है। 

दूसरी ओर, चिकित्सा व्यवसाय से जुड़े लोगों का एक तर्क यह भी है कि पैथी के नाम पर विरोध मरीजों के हित में नहीं है। होना तो यह चाहिए कि जिस पैथी में बेहतर इलाज है, उस पैथी से इलाज होना चाहिए। 

जर्मनी में आज भी आधुनिक चिकित्सकों को अनिवार्य रूप से होम्योपैथी की पढ़ाई करनी पड़ती है ताकि उन्हें दूसरी पैथी के बारे में भी प्रारंभिक जानकारी हो और मरीजों का इलाज बेहतर तरीके से हो सके।

दूसरी ओर एलोपैथी आज जितना भी आगे दिखे, सच्चाई यह है कि बहुत से मामलों में एलोपैथ में भी आर्युवेदिक दवाइयों को लेने की सलाह दी जाती है। खासतौर से लीवर से जुड़े मामलों में, पीलिया रोग में आर्युवेदिक दवाईयां ही ज्यादा कारगर होती है। 

जानकारों का मानना है कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति के पास बीमारियों को डायग्नोस करने की तकनीक उन्नत है। लेकिन इलाज करने में बाकी पैथिया उससे आगे है।

क्रॉसपैथी से जुड़े संशय

क्रॉसपैथी के गुण दोष के आधार पर इसके पक्ष एवं विपक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं। चिकित्सा व्यवसाय से जुड़े तमाम लोग एवं इस क्षेत्र में काम कर रही गैर सरकारी संस्थाएं, crosspathy का विरोध इसलिए कर रही है क्योंकि उनका मानना है कि यह मानवीय स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।

उनका मानना है है कि जब कोई डॉक्टर या वैद्य अपने द्वारा दी जा रही दवा के बारे में सैद्धांतिक तौर पर जानता ही नहीं तो उसे मरीज के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है। 

क्रॉसपैथी का सबसे ज्यादा विरोध फार्मासिस्ट एसोसिएशन कर रहे हैं। इनका मानना है कि सरकार वैद्य लोगों को अंग्रेजी दवा लिखने की छूट देने जा रही है, यह सही नहीं है। उनका कहना है कि अंग्रेजी दवा की समझ फार्मासिस्ट को वैद्य से ज्यादा है। अतः उन्हें प्रिसक्रिप्शन लिखने की अनुमति मिलनी चाहिए। 

वहीं आयुर्वेदाचार्यो का मानना है कि आर्युवेद के चिकित्सकों को अपनी पैथि पर भरोसा करते हुए, उसमें और शोध करने की जरूरत है। दूसरी पैथी में जाने की जरूरत नहीं है। 

आर्युवेद के चिकित्सकों को अपनी पैथी से भरोसा उठना शुभ संकेत नहीं है। उन्हें अपनी पैथी को समझना चाहिए, उस पर भरोसा करना चाहिए। कुछ विशेष जनहित में क्रॉसपैथी को बुरा नहीं मानते, लेकिन शर्त यह है कि जिस पैथी की दवा लिखी जा रही है उस पैथी की पढ़ाई चिकित्सक ने की हो।

क्या हो सकता है समाधान? 

दुर्भाग्य यह है की अप्राकृतिक विकास के दुष्चक्र में हम ऐसे फंस गए हैं कि बीमार होना स्वाभाविक नियति बन गई है। ऐसे में जो व्यवस्था है, उसी व्यवस्था में बेहतर क्या किया जा सकता है, इस पर विचार करना जरूरी है। 

इस लिहाज से देखा जाए तो हमे सर्वप्रथम तो यह करना चाहिए कि किस पैथी में किस रोग का इलाज बेहतर है, इसकी सूची तैयार हो। इसके लिए एक शोध दल की जरूरत है। इस शोध दल में सभी पैथीयों के जानकारों को शामिल किया जाना चाहिए। 

उनके शोध रिपोर्ट के आधार पर रोगों का विभाजन पैथी के हिसाब से करना चाहिए। इस बाबत लोगों को जागरूक करना चाहिए कि अमुक रोग के लिए अमुक पैथी बेहतर है। 

आधुनिक चिकित्सकों को भी आयुष के प्राथमिक विज्ञान से परिचय कराया जाना चाहिए। आयुष के चिकित्सकों को एलोपैथी के प्रारंभिक ज्ञान से परिचय कराया जाना चाहिए। 

इसके लिए जरूरी है कि दोनों पैथीयों के पाठ्यक्रम में एक दूसरे से संबंधित विषय का पेपर हो, ताकि दोनों पैथ के डॉक्टरों को पैथी के बारे में सामान्य जानकारी मिल सके। वस्तुत: अपना-अपना पैथी ठीक तरह से चलाने की आवश्यकता है। इसके अलावा जो ज्ञान लुप्त हो रहा है उसे भी उठाने की जरूरत है। 

इंटीग्रेटेड मेडिसिन का मुद्दा काफी समय से उठ रहा है। दवा आदमियों के लिए ही होता है। हम एलोपैथी का तिरस्कार भी नहीं कर सकते। आदमी के लिए जो भी बेहतर है, उसका इस्तेमाल करने में कोई खराबी नहीं है। 

इमरजेंसी दवाइयों के लिए क्रैशकोर्स कराने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। एलोपैथी में बहुत सी सफलताएं मिली है। इसके साथ साथ आयुष में भी बहुत रोगों के इलाज में सफलता मिली है। 

यह जरूरी है कि लोगों को यह बताया जाए कि किस पैथी में किस रोग का बेहतर इलाज है ताकि लोगों को अपने इलाज के लिए भटकना न पड़े। 

पांचवी क्लास के बाद प्रत्येक छात्र को योग आयुर्वेद का एक पेपर भी पढ़ाया जाना चाहिए। यदि योग आयुर्वेद की पढ़ाई ढंग से की जाए तो बहुत से रोगों का इलाज तो प्रारंभिक स्तर पर ही संभव हो जाएगा। ऐसे में रोगी को अलग-अलग पैथ के लिए भटकने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

धन्यवाद

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