खेलों का स्वास्थ्य से सम्बन्ध

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खेलों का स्वास्थ्य से सम्बन्ध

Health and Sports

प्राचीन समय में जब ओलंपिक खेलों की शुरुआत हुई तो उसकी मुख्य अवधारणा यही थी कि खेलों के जरिए समाज और लोगों को स्वस्थ रखा जा सकता है। इन खेलों के जरिए स्वास्थ्य को लेकर एक खास संदेश दिया जाता है, समाज इसे ग्रहण भी करता है।

ओलंपिक खेलों की शुरुआत यूनान से हुई। यूनान के अधिकतर लोग इन खेलों में हिस्सा लेते थे। उस समय यूनान को दुनिया का सबसे स्वस्थ लोगों का देश भी माना जाता था। वर्तमान समय में भी वो देश और समाज ज्यादा खुशहाल और स्वस्थ है, जहां रोजमर्रा के जीवन में खेलो की अनिवार्य भूमिका है। चाहे वो नियमित रनिंग या दौड़ने में हो या तेज कदमों से टहलना, साइकलिंग, तैराकी या फिर अन्य खेल गतिविधियां। 

खेलों का हमारे स्वास्थ्य पर जितना प्रभाव पड़ता है, उतना शायद ही किसी और बात का पड़ता हो।

इन सब बातों से प्रेरित होकर अब आमतौर पर डॉक्टरों से लेकर फिटनेस गुरु तक एक ही संदेश लोगों को देते हैं कि अपने जीवन में खेलों को किसी न किसी रूप में शामिल जरूर करें। इससे स्वास्थ्य पर गुणात्मक असर पड़ेगा। आप शारीरिक से लेकर मानसिक तौर पर ज्यादा स्वस्थ और खुश महसूस करेंगे, ज्यादा फिट रहेंगे।

समाज में खेलों का सम्बन्ध उतना ही पुराना है जितनी हमारी सभ्यता की ओर आगे बढ़ने की कहानी। सभी खेल नैसर्गिक तौर पर हमारी जिंदगी में शामिल होते चले गए। एक प्रसिद्ध मुहावरा है “स्वस्थ बुद्धि स्वस्थ शरीर में होती है” इसलिए मन व शरीर का परस्पर तालमेल बहुत जरूरी है।

स्वास्थ्य की चर्चा करते समय अक्सर हमारा ध्यान बीमारियों के उपचार पर केंद्रित हो जाता है। जबकि वास्तव में स्वास्थ्य केवल उपचार नहीं बल्कि निरोग अर्थात रोगमुक्त रहने की संकल्पना है। रोगों से दूर रहने की इस संकल्पना को साकार करने के लिए एक विशिष्ट स्वास्थ्य अनुकूल जीवन शैली की आवश्यकता होती है। खेल ऐसी ही जीवन शैली का एक हिस्सा है। 

खेलों से फिटनेस और स्वास्थ्य के अंतर्संबंध सीधे तौर पर दिखाई देते है। नियमित तौर पर खेलकूद निश्चित तौर पर उपचार के रूप में स्वास्थ्य पर होने वाले निवेश को कम करेगा।

अंग्रेजी में कहावत है- आर यू गेम। हालांकि इस कहावत के मूल में खेल ही है। जिसका आशय है कि जीवन और खेलों का खास संबंध है। हमारे प्राचीन समय में खेलों के महत्व को बखूबी समझा जाता था। उस समय लोग अपने रोज के काम के दौरान ही तमाम बातें ऐसी करते थे जो हमें खेलों के करीब रखती थी। 

हम तब रोज पैदल चलते थे, दौड़ते थे, वर्जिश करते थे। ऐसे काम करते थे जो हमारे पूरे शरीर में हरकत लाते रहते थे। इससे हम ज्यादा ऑक्सीजन लेते थे। खून का बहाव शरीर में ज्यादा और एक समान होता था। पैर से लेकर सिर तक रक्त का बहाव अवरुद्ध नहीं होता था। इससे हम रक्तचाप और डायबिटीज की बीमारियों से दूर रहते थे। वे बीमारियां पास भी नहीं आती थी जो आजकल की जीवन शैली के जरिए हमारे अंदर जगह बना चुकी है।

अगर प्राचीन भारत के ही जीवन पर गौर फरमाएं तो आपको लगेगा कि तब हमारा समाज खेलों के कितने करीब था। जब हम खेलों की बात करते हैं तो यकीनन इसका मतलब उन शारीरिक प्रक्रियाओं से होता है जो खुशनुमा तरीके से सारे शरीर को ज्यादा Movements देने वाली होती हैं।

तब सुबह की शुरुआत भौर में होती थी। योग, व्यायाम, कुश्ती, घुड़सवारी और शस्त्र कला से जुड़ी शालाए सक्रिय दिखने लगती थी। जो लोग यहां नहीं जा पाते थे वो घरों में योग और व्यायाम कर लेते थे। यह आमतौर पर सभी के लिए अनिवार्य था और हर कोई किसी ना किसी तरह इन से जुड़ा था। 

इसी का परिणाम था कि समाज ज्यादा स्वस्थ समाज था। लोग लंबे समय तक निरोग रहते थे, खुश रहते थे और बलिष्ठ रहते थे। कुछ धर्मों में तो बकायदा खेलों की खास तौर पर पैरवी की गई है। तैरने, निशानेबाजी, घुड़सवारी पर जोर दिया गया है।

बदलते समाज और नए दौर में जैसे-जैसे हम मशीनों और आराम तलब जिंदगी की गिरफ्त में आते चले गए हमारा शरीर अस्वस्थ होने लगा। हम ज्यादा जल्दी कम उम्र में ही कहीं ज्यादा बीमारियों की पकड़ में आने लगे। 

आलस्य एवं शारीरिक निष्क्रियता शरीर को कमजोर करती है या बहुत अधिक मोटा बना देती है। ऐसे लोग मानसिक रूप से शांत एवं प्रफुल्लित नहीं रह सकते। ऐसे लोग सामान्य रूप से चिड़चिडे, झगड़ालू, टालमटोल करने वाले हो जाते हैं। उनके शरीर पर भी बुरा प्रभाव पड़ने लगता है।

सप्ताह में कम से कम 3 दिन की तैराकी करना, मांसपेशियों की मजबूती और वजन कम करने के लिए सटीक कहीं गई है। अमेरिकन कॉलेज ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन के एक शोध के अनुसार 1 घंटे की तैराकी से आप 878 कैलोरी बर्न करते हैं। जिससे शरीर में हल्का पन और ताजगी महसूस करने लगते हैं। अक्सर पीठ दर्द की शिकायत करने वालों को तैराकी करने की सलाह दी जाती है। इससे ये समस्या असरदार ढंग से दूर हो जाती है।

आधुनिक दिनचर्या के कारण दिन पर दिन हमारी प्रतिरोधक क्षमता कम होती जा रही है। ऐसे हालात में खेलों का महत्व फिर से बढ़ा भी है और समझा भी जाने लगा है। स्कूलों में अब खेलों को अनिवार्य करने की मांग उठ रही है। 

अब ज्यादातर स्कूल भी पढ़ाई के साथ खेल और फिटनेस पर भी उतना ही जोर दे रहे हैं। कोशिश की जा रही है कि बचपन से ही बच्चों को खेलों से जोड़ा जाए। 

यूरोप और अमेरिका में खेल अनिवार्य तौर पर लोगों की जिंदगी से जुड़े हैं। सुबह की शुरुआत किसी ना किसी रूप में खेलों से होती है। चाहे वह रनिंग हो, साइकिलिंग हो या फिर तैराकी या कोई और टीम खेल। इसके अलावा सप्ताहांत तो हर हाल में मुख्य तौर पर ऐसी गतिविधियों के करीब होता है जहां कुछ ना कुछ खेला जाए या फिर एडवेंचर गतिविधियां जैसे माउंटेनरिंग, ट्रैकिंग आदि की जाए।

बच्चों और किशोरों के लिए खेलों के खास फायदे हैं। इसमें हिस्सा लेने से ना केवल स्वास्थ्य और पूरे जीवन पर सकारात्मक असर पड़ता है। बल्कि अलग-अलग खेलों की शारीरिक गतिविधियों से हम अपनी सामान्य फिटनेस को बेहतर कर सकते हैं। बीमारियों से भी दूर रह सकते हैं। खेल याददाश्त भी मजबूत करते हैं। तनाव और दबाव में कमी लाने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। शरीर का वजन नहीं बढ़ेगा, शरीर में अतिरिक्त वसा इकट्ठा नहीं होगी, हड्डियों के कमजोर होने की शिकायत नहीं होती है।

एक अध्ययन के अनुसार अलग-अलग खेलों के फायदे शरीर में अलग तरह से होते हैं। जैसे टेनिस खिलाड़ियों को जीवन में बाद में भी हड्डियों की शिकायत नहीं होती। यहां तक कि अगर आप नियमित तौर पर टेनिस नहीं भी खेलते हैं तो भी हड्डियों का क्षय कम होता है। शोध में कहा गया है की टेनिस के कारण बोन मिनरल का नुकसान कम होता है। यहां तक कि जिन लोगों ने अपने किशोर अवस्था में भी टेनिस खेली है उसका फायदा उन्हें वृद्धावस्था में भी होता है।

इसी तरह एक और अध्ययन दूसरे विश्व युद्ध के 50 साल पूरे होने पर उन लोगों पर किया गया जिन्होंने एक सैनिक या सैन्य अधिकारी के रूप में विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था और जीवित थे। रिपोर्ट के अनुसार वे सैन्य कर्मी जिन्होंने हाई स्कूल में स्पोर्ट्स में हिस्सा लिया था, उन्हें डॉक्टरों की जरूरत कम पड़ती है। अध्ययन के समय यह सभी लोग 70 वर्ष या ऊपर के थे और बेहतर व स्वतंत्र जिंदगी भी जी रहे थे।

कुछ खेलों से आप लगातार अपने शरीर को बेहतर स्थिति में रख सकते हैं। आप तैराकी को ही लें इससे आपकी मांसपेशियां और ह्रदय धमनियां मजबूत होती है। महज 10 मिनट की तैराकी से ही पूरे शरीर का वर्कआउट हो जाता है। 

अगर आप तैराकी को और ज्यादा समय देते है तो इसके फायदे कहीं ज्यादा होते हैं। शरीर का गठीला पन और लचीलापन बढ़ता है। जोड़ों की समस्या दूर होती है यानी घुटने और कोहनी में आप दिक्कत महसूस नहीं करेंगे। 

तैराकी में आप ज्यादा कैलोरी खर्च करते हैं और शरीर के अनावश्यक वजन को कम करने में सफल रहते हैं। दरअसल तैराकी से शरीर की अतरिक्त वसा में कमी आती है। अगर आपकी निचली मांसपेशियां कमजोर है और शरीर के संतुलन की दिक्कत है तो ऐसे लोगों को तैराकी करने की सलाह दी जाती है। पानी में आप भार रहित होते हैं और वहां तैरने से मांसपेशियों की एक्सरसाइज हो जाती है। संतुलन में असरदार ढंग से सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ह्रदय और फेफड़े भी मजबूत होते हैं।

दौड़ने से भी शारीरिक क्षमता और मांसपेशियों में वृद्धि होती है। दौड़ने से रक्तचाप कम रहता है, हार्ट अटैक का खतरा कम होता है, फिटनेस स्तर बेहतर होता है। दौड़ने वाले धावकों की हृदय की धमनियां जहां बेहतर रहती है वही पैर की मांसपेशियां भी मजबूत होती है। उनका क्षरण कम हो जाता है। इससे आप लंबे समय तक जवान बने रहते हैं। हड्डियों के कमजोर होने की समस्या कम होती है। शरीर पर नियंत्रण बढ़ता है और स्फूर्ति के साथ चपलता में बढ़ोतरी होती है। कमजोर निचली मांसपेशियों से संबंधित लोगों को हर हाल में दौड़ने, भागने की सलाह दी जाती है।

घुड़सवारी भी शारीरिक संतुलन और मांसपेशियों को पुष्ट करने में मददगार है। इससे शरीर मजबूत होता है। यहां तक कि शारीरिक तौर पर कमजोर बच्चों के लिए घुड़सवारी आश्चर्यजनक ढंग से वरदान साबित हो सकती है। 

वेस्ट वर्जिनियां विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया कि जो किशोर शारीरिक तौर पर सक्रिय रहते हैं और इन खेलों में होते हैं। वे ज्यादा संतुष्ट और जीवन में अधिक खुश होते हैं।

कहा जाता है कि अगर आप फुटबॉल खेल रहे हैं तो शरीर का पूर्ण व्यायाम हो जाता हैं। इस खेल में पैरों का तालमेल गेंद के साथ जितना जरूरी होता है, उतना ही तेजी से दौड़ते हुए शरीर का संतुलन भी, आंखें पैनी होनी चाहिए, हैडर के लिए सिर की मजबूती चाहिए तो चपलता भी बहुत जरूरी है। 

खेलों का स्वास्थ्य से सम्बन्ध

फुटबॉल का खेल पूरे शरीर की एक्सरसाइज करा देता है। यह भी माना जाता है की फुटबॉल का अच्छा खिलाड़ी हर तरह से संपूर्ण एथलीट होता है। यह खेल आपके शरीर को जहां खेल में झोंक देता है तो शरीर को उसी तरह से स्वस्थ भी रखता है। शरीर का कोई हिस्सा ऐसा नहीं है जिस पर इस खेल के दौरान सकारात्मक असर नहीं पड़ता हो। बहुत से लोग वर्कआउट के तौर पर आमतौर पर सुबह फुटबॉल खेलना पसंद करते हैं 

खेलों का अभ्यास तन और मन दोनों को स्वस्थ रखता है। इसे खेलों का की ही कैटेगरी में रखा जाता है। दुनिया धीरे-धीरे अब इसके महत्व को समझने लगी है। इसी का परिणाम है कि इसका तेजी से प्रसार हो रहा है। 

रोज कम से कम 10 मिनट का योग भी दमखम बढ़ाने से लेकर एकाग्रता और मानसिक मजबूती में सार्थक होता है। खेलों का जितना असर प्रत्यक्ष तौर पर शारीरिक रूप से होता है उतना ही मानसिक रूप से भी। 

खेलों से हम पूरे शरीर में ज्यादा ऑक्सीजन लेते हैं। दिमाग में ऑक्सीजन की बहुलता ज्ञानात्मक क्षमताओं में वृद्धि करता है याददाश्त में बढ़ोतरी के साथ दिमाग को ज्यादा फोकस करता है। खेलो और एरोबिक से दिमाग संबंधी बीमारियां अल्जाइमर का खतरा कम हो जाता है।  शिजोफ्रेनिया पास नहीं फटकेगी। 

दिमाग जब बेहतर महसूस करेगा और उसे ऑक्सीजन के रूप में ज्यादा ऊर्जा मिलेगी तो शरीर का तालमेल भी अच्छा होगा अच्छी नींद आएगी। 

नार्वे के शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग शारीरिक रूप से जितने अधिक सक्रिय रहते हैं उनके अवसाद ग्रस्त होने की आशंका उतनी ही कम होती है। जो लोग अपने खाली समय में सक्रिय नहीं रहते उनके अवसाद ग्रस्त होने की आशंका दोगुनी हो जाती है।

अगर शारीरिक तौर पर देखें तो स्वास्थ्य और फिटनेस का सीधा संबंध खेलों से है। खेलों से शरीर के समस्त अवयवों की movements बढ़ती है। खेल अगर कम सघनता वाली लिपोप्रोटींस को कम करते हैं तो ज्यादा सघनता वाली लीपोप्रोटींस को बढ़ाते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप शरीर में कोलेस्ट्रोल की उचित मात्रा बनी रहती है। इससे रक्तचाप नियंत्रित रहता है, हार्ट अटैक और स्ट्रोक की आशंका कम हो जाती है। 

खेलों के लाभ इतने ज्यादा है कि सभी लाभो के बारे में इस लेख में लिखना मुश्किल होगा। खेलों के दौरान हम जिन शारीरिक एक्सरसाइज से गुजरते हैं वे डायबिटीज और आस्टियोपोरोसिस से भी हमारी रक्षा करती है।

खेल कूद और व्यायाम से कुछ समय बाद हृदय की धड़कनों में संतुलन आ जाता है। कुछ समय तक व्यायाम करने से शरीर भोजन का सही उपयोग करता है। आंतरिक ग्रंथियों की गतिविधियां बेहतर हो जाती है। 

खेल हमारी मनोदशा पर भी प्रभाव डालते हैं। हमारे मूड़ को बदल देते हैं। हम जब खेलते हैं तो हमारा शरीर इंडोरफिंस जारी करता है। खेलों के दौरान इसका उत्पादन ज्यादा होने लगता है। जिसकी वजह से हम खुशी महसूस करते हैं। खेलों को इसलिए आमतौर पर निराशा और हताशा से लड़ने का सबसे कारगर हथियार माना जाता है। 

धन्यवाद

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