फटे कपड़ों से दिखता नंगा बदन

Screenshot 20200511 200703 Chrome 1

फटे कपड़ों से दिखता नंगा बदन

तुम्हारे मां बाप कौन है? सवाल के साथ ही दया की मूर्ति उस आश्रम माता ने उसे प्यार से देखा और खाने की प्लेट उसकी ओर बढ़ा दी।

चेहरे पर बिखरे हुए बाल और अस्त-व्यस्त कपड़ों में लिपटी सहमी हुई उस लड़की ने कोई ध्यान नहीं दिया। फटे कपड़ों से दिखता नंगा बदन और उस पर पड़े निशान कुछ अनहोनी की आशंका कह रहे थे। 

लेकिन मनुष्य आशावादी प्राणी होता है, सुन लेने पर ही किसी परिणाम पर पहुंचना चाहता है। 

इसलिए मन की गति को रोककर आश्रम माता बार-बार यही जानने का प्रयास कर रही थी कि कहीं उसके साथ कुछ गलत तो नहीं हुआ। वह उस लड़की के दुख में शामिल होना चाहती थी। साथ-साथ डर भी रही थी। 

किसी अनहोनी के साथ जीवित रहना कितना अपमानजनक लगता है? हर नजर से उठता सवाल बिना कोई जवाब पाए वापस नहीं जाता है। 

शायद यह बात आश्रम माता को पता थी। वह उसकी मनोदशा को समझ रही थी। पुनः सवाल उठाती नजरों के साथ आश्रम माता ने उस लड़की के बालों को उसके चेहरे से हटाते हुए, पीछे किया और खाने की ओर इशारा किया।

लड़की की आंखों से पानी की धाराएं निकलकर उसके मुरझाये गालों तक आ गई। इसी पल के इंतजार में आश्रम माता ने अपने कंधे पर पड़े अंगोछे से उसके आंसू पौछ कर कहा, “रो ले बेटी, जब तक दुख आंखों से बाहर ना निकल जाए, तब तक मन में शांति नहीं मिलेगी।

इसके बाद दो-तीन अन्य जवान लड़कियां भी आश्रम के अपने कमरों से निकल कर आ गई। सभी लड़कियां दिखने में सामान्य थी। सभी ने अच्छे ढंग से कपड़े पहन रखे थे। सभी ने उस बदहाल लड़की को देखा ओर बिना किसी शरारत के उसके पीछे आकर खड़ी हो गयी। 

लड़की को देखकर जहाँ सामान्य नजरें भी किसी अनहोनी की आशंका को व्यक्त कर सकती थी। वो तो फिर भी लड़कियां थी। जो इस समाज में उठने वाले हर कदम की आहट का अपने लिए अर्थ समझती थी। इसलिए तुरत संवेदनशील हो गयी।

अपने चारों ओर स्त्रियों की उपस्थिति में उस लड़की ने ऊपर खुले आकाश की ओर सिर उठाया। परंतु शून्य में निहारती उदासीन आंखों को कुछ भी नजर नहीं आया। बस निकलती हुई आंसु धाराएं अब गालों पर ना जाकर कानों पर से गुजरने लगी थी ।

तभी पीछे खड़ी एक लड़की ने उसके सिर पर स्नेह से हाथ फिराया, गर्म और प्रेमस्पर्श को लड़की सहन न कर सकी। अब तक बंद उसकी जुबां से जोर-जोर से आवाजें आने लगी थी। दुख का पहाड़ पिघलने लगा था। 

जैसे मेघों में गर्जन निहित रहती है, वैसे ही रोने में भी शोर निहित रहता है। दुख सामूहिक होता है। अपने चारो और स्त्रियों की उपस्थिति के कारण बदहाल लड़की अपने दुख में और डूबती चली गयी।

धीरे-धीरे समय बीतता जा रहा था। लड़की को आये 2 दिन बीत चुके थे। परंतु अभी तक उसके बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं था। वह कौन है, कहां से आई है, उसके साथ क्या हुआ है कोई नहीं जानता था।

दुख कितना ही बड़ा क्यो ना हो? समय के साथ-साथ कम होता जाता है। गुमनाम रहकर जीना गुमसुम रहने की तुलना में आसान हो सकता है। चुपचाप रह कर जीवन नहीं काटा जा सकता।

तीसरे दिन सुबह सवेरे ही लड़की शीशे को देखकर जोर से चिल्लाई। आवाज सुनकर आश्रम माता व अन्य लड़कियां भाग कर उसके कमरे में आई। कमरे का दृश्य ह्रदय को कपा देने वाला था।

लड़की लगभग पूर्ण नग्न अवस्था में थी। शरीर पर पड़े निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। आश्रम माता ने भागकर एक चादर से उसके जिस्म को ढकना चाहा, जिसे उस लड़की ने उतार फेंका। 

आश्रम माता ने पुनः प्रयास किया। लेकिन कामयाब ना हो सकी। अब लड़कियों ने उसे कपड़े पहनाने की कोशिश की, जिन्हें माता ने इशारा कर मना कर दिया।

आश्रम माता समझ चुकी थी कि बदहाल और बदहवास लड़की पागलपन के स्तर तक पहुंच गई है। उसका दिमाग जो 2 दिन पहले ही छूट गया था, आज उसकी थोड़ी बहुत बची चेतना, जो उसे संभाले हुए थी। वह भी चली गई है।

शरीर और मन का संबंध कट चुका था। दुनियावी दिखाओ का अंत हो चुका था। शरीर ही स्त्री-पुरुष होता है, जबकि आत्मा ना स्त्री होता है ना पुरुष। यह ज्ञान जिसे योगी समझते हैं, और पागल उसे जीना शुरु कर देते है। वह वहाँ पहुच गयी थी। 

थोड़ी देर बाद पागलखाने से गाड़ी आई और लड़की को उसमे बैठा कर चली गई, और पीछे रह गया वह कड़वा सत्य जिसे हम रोज अखबारों में पढ़ते हैं।

.

धन्यवाद

By – Pushpraj Panwar

4 thoughts on “फटे कपड़ों से दिखता नंगा बदन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *