लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया

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हमारे देश की आजादी के 7 दशक बाद सबसे ज्यादा विमर्श लोकतंत्र में भ्रष्टाचार और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया को लेकर किया जा रहा है। समाज का दर्पण कहे जाने वाले मीडिया अथवा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका की निगरानी करने वाले मीडिया पर निगरानी की बात हो रही है।

लोकतंत्र के दर्पण रूपी मीडिया का कार्य प्रमुख रूप से चेहरे को उसी रूप में दिखाना होता है जिस रूप ने वो है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया यह कार्य बखूबी करता आया है, कर रहा है और भविष्य में भी करता रहेगा। 

लेकिन लोकतंत्र के तीनों स्तंभ आज पूजीपतियों और नौकरशाहों के भ्रष्टता में चौथा स्तंभ मीडिया भी सम्मिलित हो गया है। जो कि चौथे स्तंभ की शक्ति को कुंद कर रहा है। जिससे उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होने लगा है। इसका मतलब यह नहीं निकालना चाहिए कि मीडिया का उद्देश्य प्रॉफिट, दलाली और कल्चर कॉर्पोरेट हो गया है।

वर्तमान समय में देश में भ्रष्टाचार को पोषित करने में कतिपय मीडिया अपनी जबरदस्त भूमिका का निर्वाह कर रही है। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि मीडिया केवल भ्रष्टाचार में ही लिप्त है। 

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया समय-समय पर अपनी भूमिका का निर्माण करने में पीछे नहीं है। खोजी पत्रकारिता और स्टिंग ऑपरेशन के दम पर इसी मीडिया ने अनेकों घोटालों का पर्दाफाश किया है। देश की जनता के पसीने की कमाई का हमारे जनप्रतिनिधि और ब्यूरोक्रेट्स किस प्रकार उपयोग कर रहे हैं। इसकी जानकारी जनता तक पहुंचाने का कार्य मीडिया ही करती है। 

इस तरह से मीडिया अपने सामाजिक दायित्व का पालन करती है, जो एक सुखद पहलू है। चतुर्थ स्तंभ के रूप में मीडिया वैसे ही कार्य कर रही है, जैसा उसे करना चाहिए। 

कुछ धन लोलुप मीडिया कर्मीओ के चरित्र का आकलन कर समूचे मीडिया जगत पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना भी किसी भी दृष्टि से न्यायोचित नहीं है। 

मीडिया का दुखद पहलू है कि भारतीय सांसद लोकसभा में प्रश्न पूछने का रिश्वत लेते है। वहीं दूसरी तरफ 2जी स्पेक्ट्रम में राडिया के साथ पत्रकारों का नाम जुड़ने से मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ऐसे ही पत्रकारिता के नाम पर दलाली कर संपूर्ण पत्रकारिता जगत को पैनी नजर से देखने को मजबूर कर दिया है।

वर्तमान समय में हो रहे घोटालों का एक-एक कर सामने आना और उनमें लोकप्रिय नेताओ के सलिप्त होने ने लोकतंत्र के सिर को नीचा कर दिया है। इसके साथ ही भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो गई है कि उसने मीडिया को भी अपने घेरे में ले लिया है। 

इसके बावजूद भी मीडिया ही एक साधन है जो प्रमुख घोटालों व भ्रष्टाचारो की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने का कार्य करती है। आज लोकतंत्र में भ्रष्टाचार की स्थिति इतनी बदतर हो गई है कि हर तरफ इसी का बोलबाला है। आज आप किसी भी कार्यालय में बिना रिश्वत के काम नहीं करा सकते हैं। 

ग्लोबल करप्शन परसेप्शन इंडेक्स(वैश्विक भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक) 2019 में भारत के स्कोर में कोई सुधार नहीं हुआ और वह 41 के स्कोर के साथ 80वें रैंक पर है। 2018 में उसकी रैंकिंग 78वीं थी और स्कोर 41 ही था। 

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया

निष्पक्ष रूप से वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार का आंकलन करने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशन द्वारा जारी हालिया सर्वे के मुताबिक, भारत के इंडेक्स में कुल स्कोर 41 रहा और वह 80वें स्थान पर है। 

इसका सीधा सा अर्थ यह है कि 79 देश ऐसे है जो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में हम से आगे हैं। देश में हो रहे इन अरबों-खरबों रुपए के घोटाले से चूना देश की गरीब जनता को लगता है। सरकारी खजाने पर लगी है है यह लूट एक तरह से देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रही है।

यदि इस धन का उपयोग सही ढंग से हुआ होता तो देश की तस्वीर आज कुछ और ही होती। इसके साथ ही आम आदमी का जीवन स्तर कुछ बेहतर ही हुआ होता। 

भारतीय लोकतंत्र में संसद सबसे बड़ी पंचायत होती है। जहां बैठकर हमारे प्रतिनिधि देश-विदेश की समस्याओं पर चर्चा करते हैं पर अब वहां पर भी स्थिति बदतर हो गई है। संसद में नोट की गड्डी लेकर पहुंचना उसकी मर्यादा एवं विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है तो सांसदों द्वारा पैसे लेकर प्रश्न पूछना जनप्रतिनिधियों के गिरते स्तर को प्रकट करता है

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका कैसी हो इस पर विचार करने से पहले यह चर्चा जरूरी है कि जिस मीडिया पर लोकतंत्र के प्रहरी होने का दंभ भरा जाता है दरअसल उस मीडिया के अंदर भी लोकतंत्र है अथवा नहीं। क्योंकि सही काम वही मीडिया कर सकता है जिसका संचालन लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होता हो। 

लेकिन विडम्बना है कि मीडिया उन हाथों से संचालित है जो औद्योगिक घराने हैं या जिनके व्यापारिक हित सरकार से टकराते हैं। आज मीडिया का एक पक्ष सेलिब्रिटीज, सनसनी और संप्रदायिकता को सामने रखकर अपना धंधा जोरों पर चला रहे हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि जनता को सस्ता मनोरंजन चाहिए।

बाकी बचे मुख्यधारा के मीडिया के पास खबरें प्रस्तुत करने की हड़बड़ी और चंचलता अधिक दिखाई पड़ती है। हर बात को ब्रेकिंग न्यूज़ बताते हैं। चिल्ला चिल्ला कर बात करते हैं।

आज मीडिया वास्तविकता को परे रखकर खबरों को परोसने का कार्य कर रही है। ऐसी मीडिया प्रियंका चोपड़ा की शादी, राखी सावंत का स्वयंवर, करीना की शोख अदाएं, राजनीति की कड़वाहटे देने के सिवाय कुछ नहीं है।

पत्रकारिता का प्रोफेशनल अंदाज यही है। खबरों को तड़का बनाने का कौशल आज की पत्रकारिता का धर्म है। मालिकों की इच्छाओं पर समाचार पत्रों या चैनलों का संचालन होना चाहिए। वही संपादकों के पास प्रबंधन का जिम्मा ज्यादा है। 

मीडिया की आलोचना किसी पूर्वाग्रह से नहीं है। भारतीय मीडिया में ऐसी मिसाले है, जो आज भी पत्रकारिता को मिशन मानकर समर्पण भाव से इस उम्मीद से काम कर रहे हैं कि कोई चिराग फिर मशाल कोबनेगी और तिरोहित हो चुके मूल्यबोध का भाव नई मीडिया में रोशन करेगी।

मीडिया में अपने सिद्धांतों पर कायम रहने वाले लोग आज भी है। जो समाज के सभी सदस्यों को समाचारों के माध्यम से ताकतवर बनाते हैं। इस महान लोकतांत्रिक गणराज्य में जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार से देश को मुक्त कराने का दायित्व मीडिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

वर्तमान मीडिया अपने मूल दायित्व से विचलित प्रतीत हो रही है। आज मीडिया यह निर्णय करने में अक्षम प्रतीत होती है कि सलमान और कैटरीना के रिश्तो की चर्चा करना आवश्यक है या गंभीर राजनीतिक आर्थिक व राष्ट्र के विकास से संबंधित मुद्दों की चर्चा करना। 

आज टीआरपी की स्पर्धा में समाचारों को इतना बढ़ा चढ़ाकर चिल्ला-चिल्ला कर एवं उत्तेजक संगीत के साथ प्रस्तुत किया जाता है कि मनोरंजन और समाचार के बीच कोई सीमा रेखा ही नहीं होती।

लोगों को आकर्षित करने के लिए प्रत्येक खबर को ब्रेकिंग न्यूज़ कह कर दिखाया जाना और गंभीर मुद्दों को गौण कर दिया जाना, आज की मीडिया की पहचान बन चुकी है। कई बार यह तर्क दिया जाता है कि मीडिया हमें वही दिखाती है जो हम देखना या पढ़ना चाहते हैं। 

किंतु मीडिया का कार्य हमारे स्तर को उठाना और हम में उचित मूल्यों का निर्माण भी करना है। भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया लोगों के विचारों को प्रभावित करने या परिवर्तित करने में अहम भूमिका निभाता है। इसकी भूमिका के अंतर्गत न केवल राष्ट्र के समक्ष उपस्थित समस्याओं का समाधान खोजना शामिल है, बल्कि लोगों को शिक्षित तथा सूचित भी करना है ताकि लोगों में समालोचनात्मक जागरूकता को बढ़ावा दिया जा सके।

यदि मीडिया इन बातों को का अनुकरण करें तो वह निश्चित ही स्वयं को सही मायने में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ सिद्ध कर सकती है।

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धन्यवाद

16 thoughts on “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया

  1. आज कल साफ सुथरे news channels बहुत ही कम रह गए हैं। लेकिन आपने बहुत अच्छा लिखा है।

  2. वर्तमान मीडिया अपने मूल दायित्व से विचलित प्रतीत हो रही है। आज मीडिया यह निर्णय करने में अक्षम प्रतीत होती है कि सलमान और कैटरीना के रिश्तो की चर्चा करना आवश्यक है या गंभीर राजनीतिक आर्थिक व राष्ट्र के विकास से संबंधित मुद्दों की चर्चा करना।

  3. हालांकि मीडिया को 4 वां स्तंभ माना जाता है लेकिन यह कहना गलत नहीं है कि उन्हें बड़े राजनेताओं और व्यवसायों द्वारा खरीदा गया है

  4. आज टीआरपी की स्पर्धा में समाचारों को इतना बढ़ा चढ़ाकर चिल्ला-चिल्ला कर एवं उत्तेजक संगीत के साथ प्रस्तुत किया जाता है कि मनोरंजन और समाचार के बीच कोई सीमा रेखा ही नहीं होती।

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