किसान “बुझती आंखों में आशा की किरण”

रोज की तरह सुबह के 4:00 बजे थे, लड़खड़ाते पैरों के साथ टीमटीमाती हुई आंखें खुली, जो इशारा कर रही थी कि रात भर नींद नहीं आई। आखिर नींद आती भी कैसे, रात को अचानक हुई ओलावृष्टि एवं वर्षा ने Read more