Women empowerment in India

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Women empowerment in India

महिला सशक्तिकरण: भारत में महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति

भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में “नारी नारायणी” एवं “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता:” कहकर नारी को विशेष सम्मान दिया गया है और उसके महत्व को बताया गया है। महिलाओं को दिए जाने वाले सम्मान व स्त्रियों के प्रति हमारी संस्कृति की आस्था और समर्पण भाव से हम सभी अवगत हैं।

लेकिन इन आदर्शात्मक बातों से दूर धरातल की सच्चाई कुछ और ही स्थिति बयां करती है। जन्म लेने के पूर्व से लेकर जन्म लेने, किशोरावस्था व प्रौढ़ावस्था तक हर कदम पर भिन्न प्रकार की चुनौतियों से दो चार होती इस देश की महिला आबादी अपने सह अस्तित्व को लेकर संघर्षरत है।

क्या कारण है कि स्वयं किसी की बेटी होते हुए भी दादी मरने से पहले पोते का मुंह देखने की ख्वाहिश रखती है, पोती का नहीं? महिला सशक्तिकरण के अनेक पहलूओ में से कुछ पहलुओं पर ये बेहद जमीनी, किंतु जटिल प्रश्न है? संभव है की इनके उत्तर की तलाश में हम महिला सशक्तिकरण का असली मार्ग तलाश पाए।

एक अनुमान के अनुसार देश के लगभग 11 लाख प्राथमिक विद्यालयों में 86% से अधिक गांवों में है। लेकिन अभी सैकड़ों गांव की लड़कियां निरक्षर है। इसके एक नहीं बल्कि अनेक कारण है।

महिला सशक्तिकरण के लिए कानून

महिला सशक्तिकरण हेतु संसद द्वारा महिलाओं के अधिकारों के सरंक्षण के लिए समय-समय पर कानूनों का प्रावधान किया गया है। जिसमें समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976, प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम 1961, बाल विवाह निषेध अधिनियम 1976, वेश्यावृत्ति निवारण अधिनियम 1986, सती प्रथा निरोधक अधिनियम 1987, प्रसव पूर्व निदान तकनीकी अधिनियम 1994, गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम 1981, अनैतिक व्यापार निरोधक 1959 (1986 में संशोधन), घरेलू हिंसा रोकथाम अधिनियम 2005, हिंदू उत्तराधिकारी संशोधन अधिनियम 2005 आदि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं।

महात्मा गांधी ने शिक्षा को बच्चों के सर्वागीण विकास का द्वार बताते हुए कहा है- शिक्षा बालक तथा व्यक्ति के शरीर, मन एवं आत्मा की सर्वोत्तमता का सामान्य प्रकटीकरण है। यह विकास और समाज के सर्वागीण विकास को ही लक्षित करती है।

Women empowerment in India
Women empowerment: socio-economic status of women in India

“महिलाओं को वास्तव में सशक्त बनाने के लिए पहले समाज की सोच को बदलना होगा। शिक्षारूपी दीपक से समाज में फैले अशिक्षा रूपी अंधकार को मिटाना होगा तथा लड़के वे लड़की के बीच का भेद मिटाना होगा”

महात्मा गांधी जी ने वर्षों पहले कहा था ‘यदि आप एक आदमी को शिक्षित करते हैं, तो मूल रूप से आप एक व्यक्ति को ही शिक्षित करते हैं, लेकिन जब आप एक महिला को शिक्षित करते हैं, तो आप पूरे परिवार एवं समाज के साथ-साथ एक राष्ट्र को भी शिक्षित बनाते हैं’।

हमारे देश में आज भी ऐसे परिवारों की कमी नहीं है जहां लोग यह सोचकर अपनी बेटी की पढ़ाई छुड़वा देते हैं कि ‘वो तो पराया धन है, उसे तो दूसरे घर जाना ही है तो हम उसे पढ़ा कर क्या करेंगे? ऐसे लोग यह सोचते हैं की लड़कियां केवल इतना ही पड़े कि उनकी शादी ठीक-ठाक से हो जाए’।

हम सभी को ऐसे लोगों को समझाना होगा और बताना होगा कि आज के समय में लड़कियां क्या कुछ नहीं कर सकती है। आपको याद होगा हमारे देश में पहली बार सन 2015 की गणतंत्र दिवस परेड में आयोजित परेड की थीम थी नारी शक्ति।

एक महिला और महिला मार्चिंग दस्ते के नेतृत्व में ही परेड की शुरुआत हुई। गणतंत्र दिवस का यह पहला मौका था, जब थल सेना, नौसेना और वायु सेना के महिला सैन्य दल भी परेड में शामिल हुए। यह संकेत था कि देश में स्त्री सशक्तिकरण के आगे बढ़ते कदमों की उजली तस्वीर का।

उसके तुरंत बाद जब हमने पूरी दुनिया में अपने मंगल मिशन की कामयाबी के झंडे गाड़े तो हमारी भारतीय महिला वैज्ञानिकों की वैश्विक स्तर पर खूब तारीफ हुई। आजादी के इतने वर्षों बाद अब देश की आधी आबादी अपनी सफलता की नए इबारत बड़ी कुशलता से लिख रही है।

खेलों में छोटे-छोटे गांवों से किस तरह से महिलाएं निकलकर सशक्तिकरण की अवधारणा को मजबूत कर रही है। यह किसी से छिपा नहीं है। ज्यादातर खेलों में अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत का परचम पुरुषों से ज्यादा महिलाएं फहरा रही है।

अनुसंधान का क्षेत्र हो या प्रौद्योगिकी का, हर जगह महिलाओं के योगदान को देख सकते हैं। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ में 25% महिला वैज्ञानिक है, जिनकी संख्या निरंतर बढ़ रही है। अन्य वैज्ञानिक संगठनों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है।

भारतीय महिलाएं आज हर क्षेत्र में हर बाधा को पार करते हुए आगे बढ़ रही है। आज निजी क्षेत्र की कंपनियों में कुल वर्कफोर्स की 30 फीसदी भागीदारी महिलाओं की है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में महिलाओं की हिस्सेदारी तकरीबन 20% है। 

ऐसे कई क्षेत्र है जिनमें केवल पुरुषों का एकाधिकार था। आज ऐसे क्षेत्रों में भी महिलाएं अपनी क्षमता का लोहा मनवा रही है। नई पीढ़ी की कामकाजी महिलाएं महत्वाकांक्षी भी है और साहसी भी। यही वजह है कि अब कोई भी क्षेत्र महिलाओं के लिए अछूता नहीं है।

देश की प्रत्यक्ष श्रमशक्ति में 40% तथा अप्रत्यक्ष श्रमशक्ति में 90% योगदान महिलाओं का ही है। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2025 तक भारत पूरी दुनिया को 13 करोड़ कर्मचारी प्रदान कर सकेगा। इस श्रम शक्ति का बड़ा हिस्सा महिलाएं होगी।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में गांवों और कृषि कार्यों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी कम नहीं है। यह बात भी सही है की ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को जब तक ताकत नहीं मिलेगी तब तक देश का स्त्री सशक्तिकरण का सपना अधूरा ही रहेगा। लेकिन वहां भी हाल के वर्षों में उल्लेखनीय बदलाव तो दिखे है और साथ ही भविष्य में कहीं ज्यादा बदलावों की आहट भी।

1985 में नैरोबी में संपन्न अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन में पहली बार महिला सशक्तिकरण शब्द का प्रयोग किया गया। 1993 में बीजिंग में अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया।

सशक्तिकरण की प्रतीक ग्रामीण महिलाएं

भारतीय ग्रामीण महिलाओं के जीवट, आगे बढ़ने की ललक और प्रतिभा की छाप छोड़ने की कई मिसाले कायम की है।

वर्तमान समय में कई ऐसी महिलाएं उभर कर सामने आई है, जो गांव की दूसरी महिलाओं के लिए रोल मॉडल बनी और स्त्री सशक्तिकरण की अवधारणा को सही मायनों में आगे बढ़ाया।

  • हैदराबाद के वारंगल में रहने वाली ज्योति ने अपनी सीमाओं का जिस कदर विस्तार किया वह वाकई अविश्वसनीय लगता है। वो खेतीहर मजदूर के रूप में वर्ष 1989 में महज ₹5 की दिहाड़ी मजदूरी करती थी साथ ही पढ़ाई भी। वह अब अमेरिका के केज सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस में सीईओ है। वह अब कंपनी के लिए अरबों रुपए कमा रही है।
  • कुछ साल पहले इंडिया गेट स्थित राजपथ पर गणतंत्र दिवस की परेड हुई तो स्नेहा शेखावत ने वायु सेना की टुकड़ी का नेतृत्व किया था। इस खास मौके पर सेना की टुकड़ी की अगुवाई करने वाली वह देश की पहली महिला सैन्य अधिकारी थी। उनके परिवार की जड़े शेखावटी के गांवों में है। उनकी इस सफलता ने शेखावटी के गांवों की बहुत सी लड़कियों को सेना में आने के लिए प्रेरित किया। 
  • इन्हीं में एक वीणा सहारण भी है। वह आईएल-76 नाम का जहाज उड़ाने वाली देश की पहली महिला पायलट है। आईएल-76 का वजन 190 टन होता है और यातायात के हिसाब से यह देश का सबसे बड़ा जहाज है। वह शेखावटी के चूरु जिले के रतनपुरा गांव से ताल्लुक रखती है।
  • आईपीएस अंजुम आरा का जन्म लखनऊ के आजमगढ़ के छोटे से गांव कम्हरिया में हुआ। अब वह देश की दूसरी मुस्लिम महिला आईपीएस है। पढ़ाई पूरी करने के बाद आईपीएस बनने की इच्छा अंजुम ने जब पिता को बताई तो उन्होंने हौसला अफजाई की। लेकिन परिवार के बाकी सदस्य इससे खुश नहीं थे। रिश्तेदारों को तो उसका घर से निकलना तक गवारा नहीं था। अंजूम कहती है उनके परिवार में आज भी पर्दा प्रथा जारी है। कड़ी मेहनत और लगन से सन 2011 में उनका चयन आईपीएस के लिए हो गया।

ऐसे कई क्षेत्र है जिनमें केवल पुरुषों का एकाधिकार था। आज ऐसे क्षेत्रों में भी महिलाएं अपनी क्षमता का लोहा मनवा रही है। नई पीढ़ी की कामकाजी महिलाएं महत्वाकांक्षी भी है और साहसी भी। यही वजह है कि अब कोई भी क्षेत्र महिलाओं के लिए अछूता नहीं है।

निष्कर्ष स्वरूप कहा जाए तो समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार लाए जाने के लिए अभी भी अनेक प्रयास करने की आवश्यकता है। आर्थिक क्षेत्र में ज्यादातर महिलाएं अभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो सकी है

इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता की सरकार के प्रयासों ने महिलाओं की सामाजिक व आर्थिक स्थिति को पहले से बहुत बेहतर स्थिति में पहुंचाया है। लेकिन अब नए नए कानून बनाने से अधिक यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि कैसे उपलब्ध कानूनों का सही क्रियान्वयन किया जाए। ताकि अपने संवैधानिक अधिकारों का लाभ शहरों में रह रही उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाओं के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं भी उठा सकें।

धन्यवाद

22 thoughts on “Women empowerment in India

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  3. महिला सशक्तिकरण के लिए शिक्षा सबसे जरूरी है

  4. लेकिन इन आदर्शात्मक बातों से दूर धरातल की सच्चाई कुछ और ही स्थिति बयां करती है। जन्म लेने के पूर्व से लेकर जन्म लेने, किशोरावस्था व प्रौढ़ावस्था तक हर कदम पर भिन्न प्रकार की चुनौतियों से दो चार होती इस देश की महिला आबादी अपने सह अस्तित्व को लेकर संघर्षरत है।
    ऐसा ही है श्रीमान

  5. अनुसंधान का क्षेत्र हो या प्रौद्योगिकी का, हर जगह महिलाओं के योगदान को देख सकते हैं।

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